दर्द में आ रहा मज़ा साहब
तुम ने ऐसा है क्या किया साहब
ख़िज़्र की उम्र भी अता कर दी
फिर तेरा हिज्र भी दिया साहब
अब नहीं बोलते मेरे हक़ में
बन गए तुम भी अब ख़ुदा साहब
हाथ छूटे नहीं कभी अपने
उम्र भर हम रहे जुदा साहब
मुझ को छोड़ा मेरी ख़ुशी के लिए
ग़म इसी बात का रहा साहब
मुझ को अब आप बस दुआ दीजे
काम आई न कुछ दवा साहब
उस की ग़लती थी इश्क़ कर बैठा
वरना था आदमी भला साहब
ख़ुशनसीबी है तुम से इश्क़ हुआ
और ये ही मेरी सज़ा साहब
— Ashutosh Kumar "Baagi"















