ज़मीं रहना हो तुमको या हो तुमको आसमाँ रहना
हमें क्या हमको है बस इस तरह ही राएगाँ रहना
कभी ऐसा था उसकी ज़िंदगी में थे निशाँ मेरे
उसी की ज़िंदगी में अब मुझे है बे-निशाँ रहना
दुआ करता हूँ हो जाए मुकम्मल 'इश्क़ ये तेरा
कि मेरे 'इश्क़ को तो है अधूरी दास्ताँ रहना
हमारा क्या कि हम हैं आज कल शायद नहीं होंगे
मगर क़िस्सा मोहब्बत का सदा ही जावेदाँ रहना
रहो तुम फ़ूल या पत्ती रहो तुम रंग या ख़ुशबू
कहीं इक बाग़ है जिसका हमें है बाग़बाँ रहना
मकाँ यूँँ तो बहुत हैं शहर-ए-दिल में जानते हैं हम
मगर हम 'इश्क़ के मारों को है बे–साएबाँ रहना
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