अब क्या करें म'आल–ए–मुहब्बत मुहाल है

हम सादा–दिल वो दिल-बर-ए-रंगीं-जमाल है

मुझ को ये पूछना है मिरे दिल से एक बार
क्या तुझ को अपने हाल का कुछ भी ख़याल है?

आई गुज़रते वक़्त के साथ अक़्ल तब खुला
समझे थे हम 'उरूज जिसे वो ज़वाल है

क्या क्या न देखता है इस उल्फ़त में एक शख़्स
पढ़ना कलाम–ए–‘मीर’ जो इस की मिसाल है

अब तो हर एक बात से वाक़िफ़ हैं आप फिर
क्या चाहते हैं आप, ये कैसा सवाल है?

मिलते रहेंगे लोग बिछड़ते भी जाएँगे
हस्ती बस एक दौर–ए–फ़िराक़–ओ–विसाल है

सच ही कहा ‘ग़ुलाम’ ने उस शे'र में ‘अभी’
इस दौर–ए–ना–गवार में जीना कमाल है

— Abhishek Bhadauria 'Abhi'

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