Abhishek Bhadauria 'Abhi'

Abhishek Bhadauria 'Abhi'

@Bhadauriabhishek

Abhishek Bhadauria 'Abhi' shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Abhishek Bhadauria 'Abhi''s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

हो गई यार ये तो दोज़ख़ सी ज़िंदगी काश ज़िंदगी रहती — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
कुछ ज़ख़्म तो खाते ही ‘अभी’ भूल गए थे कुछ ज़ख़्म हमेशा ही हमें याद रहेंगे — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
‘अभी’ इस वक़्त को ज़ाया' न कर फिर याद आएगा ‘अभी’ ये ज़ख़्म भी तू रख छुपा कर काम आएँगे — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
वो किसी और की जान बन गई ज़िंदगी कितनी आसान बन गई — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
जो तुम ही जा चुके हो तो अब इन की क्या ज़रूरत है सो दिल की धड़कनों को अब से हम आज़ाद करते हैं — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
बताएं क्या कि कितना वक़्त हम बर्बाद करते हैं? तुम्हीं को भूल जाते हैं तुम्हीं को याद करते हैं — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
बातें बनाता है किसी फ़नकार की तरह वो इश्क़ भी करता है व्यापार की तरह — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
बात हम को कोई बताता भी नहीं है और वो हम सेे कुछ छुपाता भी नहीं है — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
नदामत, बे-क़रारी, हिज्र, ज़िल्लत और तन्हाई मोहब्बत में यही दो–चार ग़म हर–बार होते हैं — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
जाने क्या खो गया कहीं मेरा जाने क्या ढूँढ़ता ही रहता हूँ — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
ज़बाँ से बात जो निकले वो फिर वापस नहीं आती सो मैं कहने से पहले बात कह कर देख लेता हूँ — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
अब क्यूँँ मुझ को तेरी राहें हैं दिखती अब क्यूँँ मुझ को तेरा चेहरा दिखता है — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
बहुत ही ज़ोर बढ़ते जा रहे हैं तेरी ही ओर बढ़ते जा रहे हैं — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
कभी अक्सर तो या फिर कुछ दिनों के बा'द करते हैं किसी को भूल जाते हैं किसी को याद करते हैं — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
वो जिस कमरे में बात तुम्हारी होती थी अब उस कमरे से बात हमारी होती है — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
न जाने क्या ज़माना चाहता है जो मुझ को आज़माना चाहता है — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
कभी वो याद रखती थी कभी वो भूल जाती थी मगर जो भूल जाती थी उसे वो याद रहता था — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
हमें ग़म की कहीं कमी ही नहीं मिली हम को कभी ख़ुशी ही नहीं — Abhishek Bhadauria 'Abhi'

Ghazal

दिल-ए-नाशाद में इस तौर तेरी याद रहे जैसे रातों में भटकता कोई शब-ज़ाद रहे मेरे होते हुए सालिम प ज़रूरी तो नहीं कोह-ए-अंदोह-ओ-ग़म-ओ-यास मेरे बा'द रहे वहशत-ए-ज़ात हो फिर या हो ग़म-ए-तन्हाई मैं नहीं कोई तो इस बैत में आबाद रहे मसअला हल न कोई ज़ुल्म-ओ-तशद्दुद से हुआ फिर भी कुछ लोग यहाँ माइल-ए-बेदाद रहे वक़्त-ए-मा'हूद भी इस सम्त तवज्जोह ही नहीं ऐसे हालात में क्या हसरत-ए-फ़रियाद रहे मैं उसे याद न आऊँ तो कोई बात नहीं वो मुझे भूल भी जाए तो मुझे याद रहे हो ‘अभी’ क़ैद-ए-क़फ़स में तो यही बेहतर है ताइर-ए-'अक़्ल अगर जानिब-ए-सय्याद रहे — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
गो दास्तान-ए-'इश्क़ में रफ़्तार चाहिए पर क्या करें कि इश्क़ को इज़हार चाहिए बे-वक़्त तेरी याद से भरता नहीं ये दिल मुझ को तेरा ख़याल लगातार चाहिए शानों को मेरे फिर से है उस ज़ुल्फ़ की तलब दस्त-ए-तही को फिर वही रुख़्सार चाहिए राह–ए–सवाब छोड़ के राह–ए–तलब पे जाएँ जिन क़ाफ़िलों को मंज़िल–ए–दुश्वार चाहिए हम भी हज़ार रखते हैं मौज़ू'-ए-गुफ़्तुगू बस फ़र्द कोई क़ाबिल–ए–गुफ़्तार चाहिए बेबस न मुझ को जान कि अंधा नहीं हूँ मैं आँखों को महज़ हसरत–ए–दीदार चाहिए साक़ी हटा ये दुर्द–ए–तह–ए–जाम फिर ‘अभी’ पुर-कैफ़ियत है साग़र-ए-सरशार चाहिए — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
रहता है रोज़–ओ–शब यूँँ ही दिल इज़्तिराब में रग़बत नें हम को डाल दिया किस अज़ाब में सब्र-ओ-क़रार अब तो बस आएँगे ख़्वाब में इक लम्हा-ए-सुकूँ भी नहीं है हिसाब में आया है अब के याद कोई शख़्स इस तरह निकला हो जैसे फूल पुरानी किताब में जिस में जुदा हुई हो तमन्ना ज़मीर से हम को वो पल मिला ही नहीं एहतिसाब में आया तो है पते पे मगर ग़ैर के है नाम लिक्खूँ भला मैं क्या तेरे ख़त के जवाब में सम्त–ए–ग़दीर की जो त'अम्मुल से इक निगाह सहरा दिखाई देने लगा नक़्श-ए-आब में मख़मूर उस ‘अभी’ को हो तुम ढूँढ़ते कहाँ होगा कहीं असीर वो दौर–ए–शराब में — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
ढूँढा करे है जिस को ये दिल वो कहीं नहीं दोनों जहाँ में कोई मेरा हम–नशीं नहीं आख़िर निकल रहे हैं कहाँ से ये साँप रोज़ इतनी तवील तो ये मेरी आस्तीं नहीं तन वो क़फ़स है जिस में गिरफ़्तार है ये रूह दिल वो मकाँ है जिस में कोई भी मकीं नहीं उस को भी कोई याद सताती नहीं है अब मैं भी किसी मलाल से अंदोह-गीं नहीं अहल–ए–जहाँ भला मुझे काफ़िर कहे हैं क्यूँ बेज़ार हूँ दुआ से मगर बे–यक़ीं नहीं अज़मत ख़ुदा ने बख़्शी है बस आसमान को ऐसी सिफ़त है ये की जो सर्फ़-ए-ज़मीं नहीं उन की निगाह-ए-नाज़ से पुर–लौ न हो ‘अभी’ आशिक़ हैं उन के और भी इक बस तुम्हीं नहीं — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
अब क्या करें म'आल–ए–मुहब्बत मुहाल है हम सादा–दिल वो दिल-बर-ए-रंगीं-जमाल है मुझ को ये पूछना है मिरे दिल से एक बार क्या तुझ को अपने हाल का कुछ भी ख़याल है? आई गुज़रते वक़्त के साथ अक़्ल तब खुला समझे थे हम 'उरूज जिसे वो ज़वाल है क्या क्या न देखता है इस उल्फ़त में एक शख़्स पढ़ना कलाम–ए–‘मीर’ जो इस की मिसाल है अब तो हर एक बात से वाक़िफ़ हैं आप फिर क्या चाहते हैं आप, ये कैसा सवाल है? मिलते रहेंगे लोग बिछड़ते भी जाएँगे हस्ती बस एक दौर–ए–फ़िराक़–ओ–विसाल है सच ही कहा ‘ग़ुलाम’ ने उस शे'र में ‘अभी’ इस दौर–ए–ना–गवार में जीना कमाल है — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
उम्र कट जाती है पर ये न भरा करते हैं ज़ख़्म इस दिल में कुछ ऐसे भी हुआ करते हैं हम ने जो कुछ भी किया आप की ख़ातिर ही किया आप जो करते हैं वो बहर-ए-ख़ुदा करते हैं आपसे मिल के ये मालूम हुआ है मुझ को अब भी कुछ लोग मुहब्बत में वफ़ा करते हैं काम सब छोड़ के आओ मेरे यारों हम तुम इस उदासी का सबब क्या है पता करते हैं इस वजह से भी हमें नींद नहीं आती है ख़्वाब टूटे हुए आँखों में चुभा करते हैं मैं तेरे शहर में आया तो ये जाना मैं ने एक बाज़ार में रिश्ते भी बिका करते हैं अपने घर की भी हिफ़ाज़त नहीं कर पाए ‘अभी’ बस इसी बात का अफ़सोस किया करते हैं — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
अब तो पीता भी नहीं फिर भी मचल जाता हूँ राह चलते हुए अक्सर मैं फिसल जाता हूँ इक तलब उस को भी मसरूफ़ रखा करती है मैं भी इक शख़्स की यादों से बहल जाता हूँ जानता हूँ कोई सुनने नहीं वाला है मिरी बात कहता नहीं बातों को निगल जाता हूँ आप मुझ पर न भरोसा करें बेहतर है यही वो फटा नोट हूँ ग़लती से जो चल जाता हूँ मैं तो ऐसा हूँ न तोड़ूँ कभी इक फूल भी पर तैश में आऊँ तो गुलशन भी कुचल जाता हूँ यूँँ तो पढ़ने को हैं कितनी ही किताबें लेकिन मैं सुकूँ पाने को बस सम्त-ए-ग़ज़ल जाता हूँ किसी की आँख से बहते हुए आँसू की तरह मैं किसी शख़्स से मिलने को निकल जाता हूँ एक वो वक़्त था, ग़ैरों को पसंद आता था एक ये वक़्त है, अपनों को भी खल जाता हूँ — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
पल-भर तेरे क़रीब हूँ पल-भर नहीं हूँ मैं होना जो चाहता हूँ वो अक्सर नहीं हूँ मैं क्या वस्फ़ है कि जैसे ख़ुदा हर जगह है तू क्या ज़ुल्म है कि अपने ही अंदर नहीं हूँ मैं पढ़ना कई दफ़ा पड़े मुबहम वो शे'र हूँ खुल जाए हर किसी पे जो यकसर नहीं हूँ मैं साथ उन के मुझ को देख के उन की तरह न जान लश्कर में हूँ प हिस्सा–ए–लश्कर नहीं हूँ मैं मुझ को बिखेरने में मशक़्क़त न कर कि ऐ मौज-ए-नसीम बू-ए-गुल-ए-तर नहीं हूँ मैं तौर-ओ-तरीक़-ए-हुस्न का मुझ को नहीं है इल्म रस्म-ओ-रिवाज-ए-'इश्क़ से ख़ूगर नहीं हूँ मैं मेरी तो हर नफ़स पे नविश्ता है उस का नाम ख़्वाब-ओ-ख़याल–ए-यार में क्यूँँकर नहीं हूँ मैं किस ज़ब्त-ए-दिल से उस से ये कहना पड़ा ‘अभी’ जान-ए-'अज़ीज़ तेरा मुक़द्दर नहीं हूँ मैं — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
पैदा हुए हैं ख़ाक से या आसमाँ से हम आए हैं इस जहाँ में भला किस जहाँ से हम डर है जुनून–ए–मर्ग में कर लें न ख़ुद–कुशी बेज़ार हो चुके हैं बहुत जिस्म–ओ–जाँ से हम कब तक खुलेगा उन पे तक़ाज़ा-ए-माह-ओ-साल कब तक नजात पाएँगे दर्द–ए–निहाँ से हम लाज़िम तेरा सवाल पर ऐ हम–सफ़र न पूछ लाए हैं तुझ को ढूँढ़ के वापस कहाँ से हम हम को जहाँ में अहल-ए-त'अय्युश से क्या ग़रज़ रखते त'अल्लुक़ात हैं आशुफ़्तगाँ से हम किस तौर रह सकेगा ये सालिम ज़रा बता दिल एक कोह–ए–बर्फ़ सा आतिश–ब–जाँ से हम हालत हमारी देख के लगता है ये ‘अभी’ बच कर निकल सकेंगे न क़ैद-ए-गिराँ से हम — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
ये कैसा मोड़ अब आया है ज़िंदगानी में कि आ रहा है मज़ा कार–ए–जाँ–सितानी में उसी तरह मिली है ज़िंदगी में तन्हाई मिले है जैसे सुरूर–ए–शराब पानी में तमाम उम्र रहे हम तलाश में जिस की सुकून हम को मिला है वो शे'र-ख़्वानी में नवाज़िशें हैं किसी की किसी की क़ुर्बानी मेरा ही ज़िक्र नहीं है मेरी कहानी में शरीक–ए–जुर्म ने फ़र्द-ए-हिसाब देख कहा सज़ा–ए–मौत 'अता की है मेहरबानी में गुज़र रहे हैं सुकूँ में किसी के शाम–ओ–सहर भटक रहा है कोई दश्त–ए–ला–मकानी में नज़र जो आ रहा है आप को है और कोई गुज़र चुका है ‘अभी’ मर्ग–ए–ना–गहानी में — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
दिल इश्क़-ए-ना-मुराद के आसार देख कर डरता बहुत है साया–ए–दिल–दार देख कर कुछ साल पहले तक क़रीं था वो अज़ीज़–ए–दिल सहमा हुआ हूँ वक़्त की रफ़्तार देख कर कैसे करेगी रौशनी उस की नज़र दुरुस्त अंधा हुआ जो शिद्दत–ए–अनवार देख कर मा'एल हैं किस क़दर यहाँ नाज़िम अदीब देख क़िस्सा बदल दिया है अदाकार देख कर फ़ौज–ए–हरीफ़ देख के दहशत–ज़दा नहीं हैराँ हूँ एक दोस्त को उस-पार देख कर लुत्फ़–ए–गुलाब से कई ज़्यादा हैं ज़ख़्म–ए–ख़ार सो अब गुरेज़ करता हूँ गुलज़ार देख कर सालिक ज़ी-इक़्तिदार हैं हम वो नहीं के जो लौट आएँ राह–ए–इश्क़ को दुशवार देख कर — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
पैरों में ग़म-ए-हिज्र की ज़ंजीर लिए है हाथों में किसी शख़्स की तस्वीर लिए है इक ज़ख़्म मुझे चैन से सोने नहीं देता इक ज़ख़्म मिरे ख़्वाब की ता'बीर लिए है बातें करे हैं सब ही मुहब्बत की यहाँ पर हाथों में कोई फूल कोई तीर लिए है माँ–बाप न महबूब न दुश्मन न कोई दोस्त है कोई जो मुझ–सी यहाँ तक़दीर लिए है? अब तो ख़ुदा ही जाने कहाँ जाएगी दुनिया हर शख़्स ही अब हाथ में शमशीर लिए है सुनते ही जिसे मौत ही आ जाएगी सब को कुछ ऐसी ख़बर आज ख़बर–गीर लिए है उस को न मिला गर तो किसी को न मिलेगा तदबीर इक ऐसी भी जहाँ–गीर लिए है तेरे ही किसी जुर्म का अंजाम ‘अभी’ आज तेरी दुआ का हामिल–ए–तासीर लिए है — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
भटकते शख़्स को राह–ए–सवाब मिल जाए सही ग़लत का उसे गर हिसाब मिल जाए चला ही जाऊँगा, रुकने भी कौन आया है बस इक सवाल का मेरे जवाब मिल जाए मैं चाहता था मुझे बस वही मिले लेकिन वो चाहती थी कोई कामयाब मिल जाए जो एक बार पि यूँँ उम्र भर नशे में रहूँ मिरे लबों को इक ऐसी शराब मिल जाए बदन झुलसना मिरा इस क़दर तो लाज़िम था थी आरज़ू भी मिरी आफ़्ताब मिल जाए मुझे मिली थी किसी ख़्वाब में हक़ीक़त यूँँ किसी को जैसे हक़ीक़त में ख़्वाब मिल जाए तू एक शख़्स की ख़ातिर फ़ना हो जाए ‘अभी’ दुआ यही है कि प्यासे को आब मिल जाए — Abhishek Bhadauria 'Abhi'
अब न है नींद न है चैन मुयस्सर मुझ को हाए! किस मोड़ पे ले आया मुकद्दर मुझ को जब मिरी प्यास बुझा सकता नहीं तो आख़िर क्यूँँ बुलाता है क़रीब अपने समुंदर मुझ को दौर–ए–नफ़रत में भी हासिल है मोहब्बत कितनी इस वजह से ही तो बनना था सुखन–वर मुझ को बे–ख़याली में उठा फेंका नदी में और फिर देखता रह गया पत्थर को मैं पत्थर मुझ को एक ही शख़्स बिछड़ता रहा मिलता भी रहा एक ही ज़ख़्म रुलाता रहा अक्सर मुझ को उम्र सारी ही भुलाने में बिता दी जिस को याद आता है वो इक हादसा यक–सर मुझ को रोज़ के रोज़ ‘अभी’ वक़्त पे आ जाती है इस उदासी ने बना रक्खा है दफ़्तर मुझ को — Abhishek Bhadauria 'Abhi'