यूँँ तो हम ख़ुश सभी से रहते हैं
पर ख़फ़ा भी किसी से रहते हैं
मेरी इन तीरगी सी आँखों में
ख़्वाब कुछ रौशनी से रहते हैं
एक जंगल ही है ये शहर जहाँ
जानवर आदमी से रहते हैं
मेरे अंदर नहीं उदास कोई
मेरे ग़म भी ख़ुशी से रहते हैं
दश्त भी सूखता नहीं देखो
पेड़ भी तिश्नगी से रहते हैं
आश्ना थे कभी जो लोग वो अब
अजनबी अजनबी से रहते हैं
देखना है हमें कि ज़िंदा ‘अभी’
कितने दिन शायरी से रहते हैं
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