दिल-ए-नाशाद में इस तौर तेरी याद रहे

जैसे रातों में भटकता कोई शब-ज़ाद रहे

मेरे होते हुए सालिम प ज़रूरी तो नहीं
कोह-ए-अंदोह-ओ-ग़म-ओ-यास मेरे बा'द रहे

वहशत-ए-ज़ात हो फिर या हो ग़म-ए-तन्हाई
मैं नहीं कोई तो इस बैत में आबाद रहे

मसअला हल न कोई ज़ुल्म-ओ-तशद्दुद से हुआ
फिर भी कुछ लोग यहाँ माइल-ए-बेदाद रहे

वक़्त-ए-मा'हूद भी इस सम्त तवज्जोह ही नहीं
ऐसे हालात में क्या हसरत-ए-फ़रियाद रहे

मैं उसे याद न आऊँ तो कोई बात नहीं
वो मुझे भूल भी जाए तो मुझे याद रहे

हो ‘अभी’ क़ैद-ए-क़फ़स में तो यही बेहतर है
ताइर-ए-'अक़्ल अगर जानिब-ए-सय्याद रहे

— Abhishek Bhadauria 'Abhi'

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