pairo'n men gham-e-hijr ki zanjeer li.e hai | पैरों में ग़म-ए-हिज्र की ज़ंजीर लिए है

  - Abhishek Bhadauria 'Abhi'

पैरों में ग़म-ए-हिज्र की ज़ंजीर लिए है
हाथों में किसी शख़्स की तस्वीर लिए है

इक ज़ख़्म मुझे चैन से सोने नहीं देता
इक ज़ख़्म मिरे ख़्वाब की ताबीर लिए है

बातें करे हैं सब ही मुहब्बत की यहाँ पर
हाथों में कोई फूल कोई तीर लिए है

माँ–बाप न महबूब न दुश्मन न कोई दोस्त
है कोई जो मुझ–सी यहाँ तक़दीर लिए है?

अब तो ख़ुदा ही जाने कहाँ जाएगी दुनिया
हर शख़्स ही अब हाथ में शमशीर लिए है

सुनते ही जिसे मौत ही आ जाएगी सबको
कुछ ऐसी ख़बर आज ख़बर–गीर लिए है

उसको न मिला गर तो किसी को न मिलेगा
तदबीर इक ऐसी भी जहाँ–गीर लिए है

तेरे ही किसी जुर्म का अंजाम ‘अभी’ आज
तेरी दुआ का हामिल–ए–तासीर लिए है

  - Abhishek Bhadauria 'Abhi'

Duniya Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Abhishek Bhadauria 'Abhi'

As you were reading Shayari by Abhishek Bhadauria 'Abhi'

Similar Writers

our suggestion based on Abhishek Bhadauria 'Abhi'

Similar Moods

As you were reading Duniya Shayari Shayari