देखो शब-ए-फ़िराक़ पे वारे नहीं गए
हम इस जुनून-ए-इश्क़ में मारे नहीं गए
हुस्न-ओ-जमाल–ए–गैर ने कोशिश तो की बहुत
आँखों से मेरी ख़्वाब तुम्हारे नहीं गए
मुद्दत के बा'द आइना देखा, पता चला
अब तक निशान–ए–ज़ख़्म हमारे नहीं गए
हम वो ख़याल थे जिसे सोचा नहीं गया
हम वो नसीब थे जो सँवारे नहीं गए
कहते हैं ज़िंदगी है फ़क़त चार–दिन की पर
हम से तो चार–दिन भी गुज़ारे नहीं गए
— Abhishek Bhadauria 'Abhi'















