दिल इश्क़-ए-ना-मुराद के आसार देख कर

डरता बहुत है साया–ए–दिल–दार देख कर

कुछ साल पहले तक क़रीं था वो अज़ीज़–ए–दिल
सहमा हुआ हूँ वक़्त की रफ़्तार देख कर

कैसे करेगी रौशनी उस की नज़र दुरुस्त
अंधा हुआ जो शिद्दत–ए–अनवार देख कर

मा'एल हैं किस क़दर यहाँ नाज़िम अदीब देख
क़िस्सा बदल दिया है अदाकार देख कर

फ़ौज–ए–हरीफ़ देख के दहशत–ज़दा नहीं
हैराँ हूँ एक दोस्त को उस-पार देख कर

लुत्फ़–ए–गुलाब से कई ज़्यादा हैं ज़ख़्म–ए–ख़ार
सो अब गुरेज़ करता हूँ गुलज़ार देख कर

सालिक ज़ी-इक़्तिदार हैं हम वो नहीं के जो
लौट आएँ राह–ए–इश्क़ को दुशवार देख कर

— Abhishek Bhadauria 'Abhi'

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