हद-ए-हयात से अब हम गुज़र न जाएँ कहीं

हुए जो और परेशाँ तो मर न जाएँ कहीं

वो वक़्त गुज़रा हुआ याद आ न जाए उसे
हो मेरा ज़िक्र तो आँखें वो भर न जाएँ कहीं

किसी की चाह में तुम भी न दूर हो जाओ
किसी की याद में हम भी बिखर न जाएँ कहीं

उसे ये डर कि नए ज़ख़्म इश्क़ में न मिलें
हमें ये फ़िक्र पुराने उभर न जाएँ कहीं

मैं उस गली से जो गुज़रूँ तो डर ये लगता है
किसी मकाँ पे निगाहें ठहर न जाएँ कहीं

अभी नसीब में कुछ और ही न लिक्खा हो
दुआएँ जितनी भी हैं बे-असर न जाएँ कहीं

— Abhishek Bhadauria 'Abhi'

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