हद-ए-हयात से अब हम गुज़र न जाएँ कहीं
हुए जो और परेशाँ तो मर न जाएँ कहीं
वो वक़्त गुज़रा हुआ याद आ न जाए उसे
हो मेरा ज़िक्र तो आँखें वो भर न जाएँ कहीं
किसी की चाह में तुम भी न दूर हो जाओ
किसी की याद में हम भी बिखर न जाएँ कहीं
उसे ये डर कि नए ज़ख़्म 'इश्क़ में न मिलें
हमें ये फ़िक्र पुराने उभर न जाएँ कहीं
मैं उस गली से जो गुज़रूँ तो डर ये लगता है
किसी मकाँ पे निगाहें ठहर न जाएँ कहीं
अभी नसीब में कुछ और ही न लिक्खा हो
दुआएँ जितनी भी हैं बे-असर न जाएँ कहीं
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