ab to peeta bhi nahin phir bhi machal jaata hooñ | अब तो पीता भी नहीं फिर भी मचल जाता हूँ

  - Abhishek Bhadauria 'Abhi'

अब तो पीता भी नहीं फिर भी मचल जाता हूँ
राह चलते हुए अक्सर मैं फिसल जाता हूँ

इक तलब उसको भी मसरूफ़ रखा करती है
मैं भी इक शख़्स की यादों से बहल जाता हूँ

जानता हूँ कोई सुनने नहीं वाला है मिरी
बात कहता नहीं बातों को निगल जाता हूँ

आप मुझपर न भरोसा करें बेहतर है यही
वो फटा नोट हूँ ग़लती से जो चल जाता हूँ

मैं तो ऐसा हूँ न तोड़ूँ कभी इक फूल भी पर
तैश में आऊँ तो गुलशन भी कुचल जाता हूँ

यूँँ तो पढ़ने को हैं कितनी ही किताबें लेकिन
मैं सुकूँ पाने को बस सम्त-ए-ग़ज़ल जाता हूँ

किसी की आँख से बहते हुए आँसू की तरह
मैं किसी शख़्स से मिलने को निकल जाता हूँ

एक वो वक़्त था, ग़ैरों को पसंद आता था
एक ये वक़्त है, अपनों को भी खल जाता हूँ

  - Abhishek Bhadauria 'Abhi'

Environment Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Abhishek Bhadauria 'Abhi'

As you were reading Shayari by Abhishek Bhadauria 'Abhi'

Similar Writers

our suggestion based on Abhishek Bhadauria 'Abhi'

Similar Moods

As you were reading Environment Shayari Shayari