गो दास्तान-ए-'इश्क़ में रफ़्तार चाहिए
पर क्या करें कि इश्क़ को इज़हार चाहिए
बे-वक़्त तेरी याद से भरता नहीं ये दिल
मुझ को तेरा ख़याल लगातार चाहिए
शानों को मेरे फिर से है उस ज़ुल्फ़ की तलब
दस्त-ए-तही को फिर वही रुख़्सार चाहिए
राह–ए–सवाब छोड़ के राह–ए–तलब पे जाएँ
जिन क़ाफ़िलों को मंज़िल–ए–दुश्वार चाहिए
हम भी हज़ार रखते हैं मौज़ू'-ए-गुफ़्तुगू
बस फ़र्द कोई क़ाबिल–ए–गुफ़्तार चाहिए
बेबस न मुझ को जान कि अंधा नहीं हूँ मैं
आँखों को महज़ हसरत–ए–दीदार चाहिए
साक़ी हटा ये दुर्द–ए–तह–ए–जाम फिर ‘अभी’
पुर-कैफ़ियत है साग़र-ए-सरशार चाहिए















