रहता है रोज़–ओ–शब यूँँ ही दिल इज़्तिराब में
रग़बत नें हम को डाल दिया किस अज़ाब में
सब्र-ओ-क़रार अब तो बस आएँगे ख़्वाब में
इक लम्हा-ए-सुकूँ भी नहीं है हिसाब में
आया है अब के याद कोई शख़्स इस तरह
निकला हो जैसे फूल पुरानी किताब में
जिस में जुदा हुई हो तमन्ना ज़मीर से
हम को वो पल मिला ही नहीं एहतिसाब में
आया तो है पते पे मगर ग़ैर के है नाम
लिक्खूँ भला मैं क्या तेरे ख़त के जवाब में
सम्त–ए–ग़दीर की जो त'अम्मुल से इक निगाह
सहरा दिखाई देने लगा नक़्श-ए-आब में
मख़मूर उस ‘अभी’ को हो तुम ढूँढते कहाँ
होगा कहीं असीर वो दौर–ए–शराब में
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