अब न है नींद न है चैन मुयस्सर मुझ को
हाए! किस मोड़ पे ले आया मुकद्दर मुझ को
जब मिरी प्यास बुझा सकता नहीं तो आख़िर
क्यूँ बुलाता है क़रीब अपने समुंदर मुझ को
दौर–ए–नफ़रत में भी हासिल है मोहब्बत कितनी
इस वजह से ही तो बनना था सुखन–वर मुझ को
बे–ख़याली में उठा फेंका नदी में और फिर
देखता रह गया पत्थर को मैं पत्थर मुझ को
एक ही शख़्स बिछड़ता रहा मिलता भी रहा
एक ही ज़ख़्म रुलाता रहा अक्सर मुझ को
उम्र सारी ही भुलाने में बिता दी जिस को
याद आता है वो इक हादसा यक–सर मुझ को
रोज़ के रोज़ ‘अभी’ वक़्त पे आ जाती है
इस उदासी ने बना रक्खा है दफ़्तर मुझ को
— Abhishek Bhadauria 'Abhi'















