झूठी क़स

में किसी की खा न सके
अब किसी और को सता न सके

मेरे दिल की ये बद-दुआ है तुझे
तू मुहब्बत किसी की पा न सके

दिल तिरा तोड़े कोई तेरी तरह
फिर उसे तू कभी भुला न सके

हम मुहब्बत में बे-वफ़ा निकले
जान इक दूजे पे लुटा न सके

हम तिरे दिल में तो रहे बरसों
पर तिरी ज़िंदगी में आ न सके

है दुआ मेरी ख़ुश रहे तू मगर
ज़िंदगी भर सुकून पा न सके

इत्तिफ़ाक़न जो सामने आए
देखना नज़रें वो उठा न सके

— Nasir Hayaat

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