रोज़ शाम हम बैठे उस के ख़्वाब में डूबेफिर उसे भुलाना था तो शराब में डूबेक्या सवाल पूछा था क्या ही फ़र्क़ पड़ता हैहम तो सिर्फ़ 'काफ़िर' अब इक जवाब में डूबे— Kaffir