शिगाफ़ देख के कमरे की दीवारों का
लगता है सब उजड़ गया है दीवानों का
जलती शम्अ पतंगे का घर होता है
बुझाने वाले ने सोचा नहीं परवानों का
बैठे हैं बे-हिस से दिल में इस्तिफ़्सार लिए
क्या किया जा सकता है इन अरमानों का
जिस दर पे ग़मगीं ठुकराए नहीं जाते
मय-ख़ाना ही वो घर है बेगानों का
दुनिया ने तस्लीम किया जब फ़न अपना
घर पे जमघट रहता है मेहमानों का
As you were reading Shayari by Rohan Hamirpuriya
our suggestion based on Rohan Hamirpuriya
As you were reading undefined Shayari