सोच में बैठे हुए हैं
हादसे ऐसे हुए हैं
बे-वफ़ा तुम थे न मैं था
फिर जुदा कैसे हुए हैं
ख़त पुराने सिलसिलों के
ताक पर रक्खे हुए हैं
हो गए हैं तेरे क़ाबिल
पूछ मत कैसे हुए हैं
हो गई तन्हाई तन्हा
आश्ना जब से हुए हैं
वो मिले तो उस से कहना
ग़म-ज़दा बैठे हुए हैं
अजनबी हैं सब मकाँ में
घर में सब भटके हुए हैं
बाग़बाँ से है गिला तो
फूल कम महके हुए हैं
— Rohan Hamirpuriya















