ghuroor-e-husn kyun itnaa nahin ye baat achchhii hai | ग़ुरूर-ए-हुस्न क्यूँ इतना नहीं ये बात अच्छी है

  - Lalit Mohan Joshi

ग़ुरूर-ए-हुस्न क्यूँ इतना नहीं ये बात अच्छी है
बजी कुछ तालियों ने ज़ात उसकी तो बताई है

वो है कमज़ोर कितना ये समझ में आ गया हमको
हक़ीक़त यार उसने अपनी ऐसे ही दिखाई है

तुम्हारी कामयाबी के तो चर्चे चार दिन होंगे
मगर इक दिन तुम्हारी तो कहानी ख़त्म होनी है

हिदायत यार तुमको है फ़क़त ख़ुद पर अमल करना
समय रहते तो अक्सर यार बिगड़ी बात बनती है

अगर ज़िंदा हो तो ज़िंदादिली के साथ जीना है
ग़ज़ल तुमको ललित की यार बस इतना सिखाती है

  - Lalit Mohan Joshi

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