hazaaron ghamon ko chhupata raha hooñ | हजारों ग़मों को छुपाता रहा हूँ

  - Lalit Mohan Joshi

हजारों ग़मों को छुपाता रहा हूँ
रक़ीबों की दुनिया में क्या पा रहा हूँ

यहाँ ग़म बहुत है मैं सहता रहा हूँ
हँसी चेहरा दुनिया में लाता रहा हूँ

चुभन मैंने काँटों भरी जो सही है
गुलाबों से यारी दिखाता रहा हूँ

उन्हें क्या ख़बर है मेरी तो यहाँ पर
सभी महफ़िलों को हँसाता रहा हूँ

मेरी तो ग़ज़ल अब सभी को है भाती
इनायत ख़ुदा की मैं पाता रहा हूँ

जहाँ क़त्ल होगा वहाँ ख़ून होगा
यहाँ डर से ख़ुद को मैं खोता रहा हूँ

उदासी भरा चेहरा क्यूँ है तुम्हारा
शिकन चेहरे की यार सुन पा रहा हूँ

  - Lalit Mohan Joshi

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