ख़िज़ाँ में अब बहार आई है फिर से
हवा गुलशन में लहराई है फिर से
इसे एहसास तेरे जाने का है
मिरी ये ऑंख पथराई है फिर से
मुझे मिलना है फिर उस बेवफ़ा से
पुरानी याद दफ़नाई है फिर से
क़दम रक्खे हैं उसने फिर से बाहर
ये देखो शाम शरमाई है फिर से
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