ख़िज़ाँ में अब बहार आई है फिर से
हवा गुलशन में लहराई है फिर से
इसे एहसास तेरे जाने का है
मिरी ये आँख पथराई है फिर से
मुझे मिलना है फिर उस बे-वफ़ा से
पुरानी याद दफ़नाई है फिर से
क़दम रक्खे हैं उस ने फिर से बाहर
ये देखो शाम शरमाई है फिर से
— Manish Yadav















