या तो कुछ भी नहीं रहा बाक़ीया सिमट आया बहर-ओ-बर मुझ मेंमैं कि इक सानिहा हूँ लम्हों काहोता क्या क्या है लम्हा-भर मुझ में— MIR SHAHRYAAR