कहाँ ढूँढ़ते हो मुझे इस जहाँ में
मैं खोया हूँ ख़ुद की ही इक दास्ताँ में
जो ख़्वाबों से निकला हक़ीक़त को देखा
मिरे पास कुछ भी न था इस जहाँ में
कोई पूछ बैठे तो क्या हाल लिख दूँ
बस इक चुप है लिपटी हुई दास्ताँ में
कभी अश्क बन कर बहा ख़ुद से बाहर
कभी क़ैद था मैं ही अपनी अज़ाँ में
— Meem Mohammed















