
अज़ राहे सुख़न जब भी क़लम मेरा उठा है
अफ़्कार की दुनिया का नया बाब खुला है
सच्चाई तो ये है कि अभी मुझ सेा क़लमकार
लफ़्ज़ों को बरतने का हुनर सीख रहा है
— Moid Rahbar
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