हर एक को अपना समझ लेता हूँ मैंअपनी ग़ज़ल से ही उलझ लेता हूँ मैंचलता हूँ मैं जब तल्ख़ माज़ी को भुलाहर पल को फिर बीता समझ लेता हूँ मैं— Musafir naami