हैरत नहीं कि आप को उल्फ़त नहीं रही
सारे ख़फ़ा हैं हम पे जो दौलत नहीं रही
इक दोस्त ही ने दुश्मनी कर ली है इस क़दर
अब और दुश्मनों की ज़रूरत नहीं रही
कहते थे कल तलक जो बुला लेना चाहे जब
मिलने की आज उन को भी फ़ुर्सत नहीं रही
भरते हैं जो तिजोरी ग़रीबों को लूटकर
करते हैं वो भी ये गिला बरकत नहीं रहे
तुम को है जाना जाओ तुम्हारा है फ़ैसला
मुझ को तो अब मनाने की आदत नहीं रही
उन से मिली नज़र यूँ गिरफ़्तार हो गए
दिल पर भी अब तो यार हुकूमत नहीं रही
'नाज़िम' न पूछ ढाए मोहब्बत ने क्या सितम
करने की फिर से इश्क़ तबीअत नहीं रही
— Najmu Ansari Nazim















