जाग कर ख़ुद मुझे सुलाती थी
माँ मुझे लाडला बताती थी
मैं तो बस बैठ जाता था खाने
अपने हाथों से माँ खिलाती थी
हाए वो कितना अच्छा था बचपन
क़िस्से नानी हमें सुनाती थी
कटने से पहले पेड़ आँगन का
रोज़ कोयलिया गीत गाती थी
यूँ भी शक सारे मुझ पे करते थे
वो मुझे देख मुस्कुराती थी
ये ज़रूरी नहीं मोहब्बत हो
यार वो यूँ ही मिलने आती थी
उफ़ वो नाज़िम अदाएँ भी उस की
दिल दिवाने पे क़हर ढाती थी
— Najmu Ansari Nazim















