ye munaasib hai nahin ab sab bataa doon aapko | ये मुनासिब है नहीं अब सब बता दूँ आपको

  - Ravi 'VEER'

ये मुनासिब है नहीं अब सब बता दूँ आपको
गर ख़ता मेरी रही तो क्यूँँ सज़ा दूँ आपको

मैं भरोसे में लुटा आया वफ़ा इक शख़्स पर
अब बचा कुछ भी नहीं सो क्या वफ़ा दूँ आपको

आँसुओं का इक समंदर है मेरी आँखों तले
है नहीं मेरा इरादा यूँँ डुबा दूँ आपको

ये उसूल-ए-इश्क़ में लिक्खा कहीं पर है नहीं
आप मुझको दें वफ़ा और मैं जफ़ा दूँ आपको

टूट कर बिखरा हुँआ इक आईना हूँ यार मैं
है नहीं ख़ुद को मसर्रत, क्या मज़ा दूँ आपको

'वीर' की ग़ज़लों में पैहम दर्द ही मिल पाएगा
अब नहीं बस में मेरे ख़ुशियाँ सुना दूँ आपको

  - Ravi 'VEER'

Samundar Shayari

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