मुझ सा कोई हालात का मारा भी नहीं था

पर मैं कभी हालात से हारा भी नहीं था

ग़ैरो से गिला क्या ही करें वक़्त-ए-मुसीबत
हम को किसी अपने का सहारा भी नहीं था

फिर क्यूँ मुझे मिल पाया नहीं हक़ मेरा या रब
हक़ मैं ने किसी का कभी मारा भी नहीं था

ख़ुद कुछ नहीं करते थे वो और उस पे मुसीबत
करते थे अगर हम तो गवारा भी नहीं था

मजबूरी तेरे दर पे हमें लाई है वरना
मिलने का इरादा तो हमारा भी नहीं था

क्या करते अगर तेरे ख़यालों में न रहते
जीने के लिए और सहारा भी नहीं था

हम दिल से उतर जाने का डर रक्खे थे दिल में
और उस ने हमें दिल में उतारा भी नहीं था

फिर क्यूँ मिरे कानों में सदा आती थी उस की
उस ने तो कभी मुझ को पुकारा भी नहीं था

ये मस्जिदें तब से यहाँ मौजूद हैं जाहिल
जब नाम-ओ-निशाँ कोई तुम्हारा भी नहीं था

क्या करता अगर हिंदू मुसलमान न करता
कुर्सी के लिए दूसरा चारा भी नहीं था

सैफ़ अहल-ए-मोहब्बत ने बताया हमें जितना
इतना तो मोहब्बत में ख़सारा भी नहीं था

— Saif Dehlvi

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