Saif Dehlvi

Saif Dehlvi

@Saif

Saif Dehlvi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Saif Dehlvi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ता-उम्र तिरे पास ये बैठे न रहेंगे नादाँ तू बुज़ुर्गों को ज़रा वक़्त दिया कर — Saif Dehlvi
चाँद तारों से बात ख़त्म हुई अब तो सो जाओ रात ख़त्म हुई — Saif Dehlvi
भूलने वाले तिरे सर की क़सम शाम के बा'द याद कर कर के तुझे रोते हैं हम शाम के बा'द — Saif Dehlvi
देख ले आ के कभी चैन से सोने वाले कैसे बेचैन फिरे हैं तुझे खोने वाले — Saif Dehlvi
हम घर से तो चले थे किसी और काम को फिर यूँँ हुआ कि उन की गली याद आ गई — Saif Dehlvi
ये और बात बताओ न तुम हमें लेकिन किसी के ख़्वाब तो आँखों में पल रहे होंगे — Saif Dehlvi
हरगिज़ न अपने दिल में मेरा मलाल रखना देखो जहाँ भी रहना अपना ख़याल रखना — Saif Dehlvi
हक़ की आवाज़ तो गूॅंगा भी उठा सकता है हौसला चाहिए आवाज़ उठाने के लिए — Saif Dehlvi
जुदाई मुक़द्दर में लिक्खी हुई थी न तुम बे-वफ़ा थीं न मैं बे-वफ़ा था — Saif Dehlvi
दिल ने चाहा न कोई और मेरे तेरे सिवा लब पे आया न कोई नाम तिरे नाम के बा'द — Saif Dehlvi
तुम इन्तिज़ार तो कर दोगे ख़त्म आ के मगर न कर सकोगे अदा मेरे इन्तिज़ार का हक़ — Saif Dehlvi
दिन रात सुब्ह शाम कई साल लग गए पाने में ये मुक़ाम कई साल लग गए — Saif Dehlvi
तू इक जनाज़ा उठाने में इतना टूट गया नज़र उठा के ज़रा देख कर्बला की तरफ़ — Saif Dehlvi
अहमक़ नहीं जो ज़ाया' करूँँ चार दिन भी मैं काटूँगा आरज़ू में न ही इन्तिज़ार में — Saif Dehlvi
तुम उस से पूछना कभी रफ़्तार वक़्त की बैठा हुआ हो जो किसी के इन्तिज़ार में — Saif Dehlvi
देखो इंसान टूट जाता है जब कोई आस टूट जाती है — Saif Dehlvi
ग़ैर तो ग़ैर थे जो कुछ भी वो कहते कहते हाए अफ़्सोस कि तुम ने भी ग़लत मान लिया — Saif Dehlvi

Ghazal

मुझ सा कोई हालात का मारा भी नहीं था पर मैं कभी हालात से हारा भी नहीं था ग़ैरो से गिला क्या ही करें वक़्त-ए-मुसीबत हम को किसी अपने का सहारा भी नहीं था फिर क्यूँँ मुझे मिल पाया नहीं हक़ मेरा या रब हक़ मैं ने किसी का कभी मारा भी नहीं था ख़ुद कुछ नहीं करते थे वो और उस पे मुसीबत करते थे अगर हम तो गवारा भी नहीं था मजबूरी तेरे दर पे हमें लाई है वरना मिलने का इरादा तो हमारा भी नहीं था क्या करते अगर तेरे ख़यालों में न रहते जीने के लिए और सहारा भी नहीं था हम दिल से उतर जाने का डर रक्खे थे दिल में और उस ने हमें दिल में उतारा भी नहीं था फिर क्यूँँ मिरे कानों में सदा आती थी उस की उस ने तो कभी मुझ को पुकारा भी नहीं था ये मस्जिदें तब से यहाँ मौजूद हैं जाहिल जब नाम-ओ-निशाँ कोई तुम्हारा भी नहीं था क्या करता अगर हिंदू मुसलमान न करता कुर्सी के लिए दूसरा चारा भी नहीं था सैफ़ अहल-ए-मोहब्बत ने बताया हमें जितना इतना तो मोहब्बत में ख़सारा भी नहीं था — Saif Dehlvi
आसान नहीं करना कोई प्यार मोहब्बत इंसाँ को भुला देती है संसार मोहब्बत ज़िन्दा में हो शूमार न मुर्दे में हो शूमार वो मारती है आदमी को मार मोहब्बत तुम मेरी मोहब्बत में गली तक नहीं आते ले आई ज़ुलैख़ा को तो बाज़ार मोहब्बत तू दूर रह इस से कि बना देती है प्यारे अच्छे भले इंसान को बीमार मोहब्बत इंसान को इंसान के मज़हब से न तोलो इंसान हो इन्साँ से करो प्यार मोहब्बत ये अहल-ए-मोहब्बत ने ज़माने को बताया नफ़रत की गिरा देती है दीवार मोहब्बत एहसास मिरे हाल का हो जाएगा तुझ को तू सैफ़ ज़रा कर तो ले एक बार मोहब्बत — Saif Dehlvi
आरज़ू ये है मिरी जान की जाते जाते इक महल हम भी तेरे नाम बनाते जाते हम को तस्वीर बनानी नहीं आती वरना उम्र भर हम तिरी तस्वीर बनाते जाते किस लिए छोड़ गए तोड़ गए क्यूँँ रिश्ता जाते जाते हमें इतना तो बताते जाते ज़िन्दगी भर के लिए छोड़ के जाना था अगर कम से कम नक़्श-ए-कफ़-ए-पा तो मिटाते जाते ठोकरें खा के सॅंभलना तुम्हें कैसे आता हम अगर राह के पत्थर को हटाते जाते वो भी मुड़ मुड़ के कहाँ तक हमें देखे जाता हम भी कब तक उसे आवाज़ लगाते जाते उन से कहना कि बहुत याद किया है उन को उन के दीवाने ने इस दहर से जाते जाते मुफ़लिसी ले गई सुख चैन हमारा वरना ज़िंदगी हम भी तेरे नाज़ उठाते जाते वो चराग़ों का मुक़द्दर था कि जलते बुझते आप का काम जलाना था जलाते जाते — Saif Dehlvi
मैं बताता हूँ तुम्हें क्या है मोहब्बत करना ख़ुद-ब-ख़ुद अपने दिल-ओ-जाँ की शहादत करना ये तो तुम करना मगर देखो ये तुम मत करना कितना आसान है औरों को नसीहत करना मैं ने सीने से लगा कर इसे रक्खा था मगर तुम को देता हूँ मिरे दिल की हिफ़ाज़त करना रू-ब-रू यार के पलकें न उठीं लब न हिले कितना दुश्वार है इज़हार-ए-मोहब्बत करना जो भी आएगा वो दौलत पे नज़र डालेगा कोई देखेगा नहीं आप की मेहनत करना ख़ुद-ब-ख़ुद होती गई है मुझे आदत तेरी मैं ने चाहा ही नहीं था तुझे आदत करना मेरे मालिक ये दुआ है ये गुज़ारिश मेरी वो जहाँ भी रहे तू उस की हिफ़ाज़त करना — Saif Dehlvi
इतना नहीं नज़र को ही भाता चला गया वो शख़्स मेरे दिल में समाता चला गया मेरे क़लम ने ख़ास तो कुछ भी नहीं किया जो सो रहे थे उन को जगाता चला गया अफ़्सोस ज़िन्दगी ने मिरा साथ न दिया मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया यारो कमाल है कि वो मेरा न बन सका लेकिन मुझे वो अपना बनाता चला गया उस ने तो मेरे राज़ को रहने दिया न राज़ मैं किस को अपना राज़ बताता चला गया लोगों ने मेरा रास्ता रोका था मैं मगर पानी की तरह राह बनाता चला गया तब तक नज़र में उन की मैं अच्छा बना रहा जब तक कि हाँ में हाँ मैं मिलाता चला गया कहता गया कि दिल को दुखाना सही नहीं और साथ साथ दिल को दुखाता चला गया — Saif Dehlvi
मेरी आँखों को धोका हो रहा है या सचमुच वो किसी का हो रहा है कहीं मंदिर कहीं मस्जिद है गिरती तेरी दुनिया में क्या क्या हो रहा है कोई ऐ काश उन को ये बता दे कोई उन का दिवाना हो रहा है नहीं ये मैं नहीं हूँ आइने में यक़ीनन मुझ को धोका हो रहा है भरोसे के नहीं क़ाबिल वो लेकिन मुझे उस पर भरोसा हो रहा है ख़ुदा के बंदे भूखे मर रहे हैं ख़ुदा के घर पे ख़र्चा हो रहा है कोई रस्ता तुम्हारा तकता होगा चलो अब घर अँधेरा हो रहा है नहीं है आरज़ू अब कोई दिल में तेरे बिन बस गुज़ारा हो रहा है चलो आओ ज़रा सा चल के देखें किसी के घर में झगड़ा हो रहा है जहाँ कल भाई भाई खेलते थे उसी आँगन का हिस्सा हो रहा है — Saif Dehlvi
मालूम नहीं हम को किधर जाएँगे तुम बिन महसूस ये होता है कि मर जाएँगे तुम बिन फिर हम को समेटा नहीं जाएगा किसी से इस तरह मिरी जान बिखर जाएँगे तुम बिन ये चाँद सितारे ये बहारें ये नज़ारे सारे ही मिरे दिल से उतर जाएँगे तुम बिन पूछेगा कोई तुम को तो क्या उस से कहेंगे तन्हा किसी महफ़िल में अगर जाएँगे तुम बिन जिस राह पे चलते थे कभी साथ में हम तुम उस राह पे अक्सर ही ठहर जाएँगे तुम बिन कुछ लोग थे जिन के लिए जीना पड़ा हम को वरना यही सोचा था कि मर जाएँगे तुम बिन ऐ 'सैफ़' तुम्हारे सिवा कोई नहीं जिन का सोचो ज़रा वो लोग किधर जाएँगे तुम बिन — Saif Dehlvi
लोगों को दिलाएगी ग़ज़ल याद हमारी होगी न कभी शा'इरी बर्बाद हमारी ख़ुद साहिब-ए-औलाद है औलाद हमारी फिर भी नहीं आती है उसे याद हमारी रोता है सुब्ह शाम ये कह कह के फिलिस्तीन मलबे में दबी मरती है औलाद हमारी इस वक़्त-ए-मुसीबत में हमें देखना ये है अब कौन करे आन के इमदाद हमारी माबूद जहाँ भी रहे आबाद रहे वो वो कर गया जो ज़िन्दगी बर्बाद हमारी हम ख़ुद भी उन्हें भुल गए उन से बिछड़ कर और उन को भी आई न कभी याद हमारी हम सब से मुसीबत में मदद माँग रहे थे अफ़सोस किसी ने न की इमदाद हमारी जो हम को मिटाने के तलबगार हैं सुन लें कम हो नहीं सकती कभी तादाद हमारी हम तेरे अलावा न सुनाऍंगे किसी को जो सुनना भी चाहे कोई फ़रियाद हमारी देखो तो बदन क़ैद है बरसों से हमारा सोचो जो अगर सोच है आज़ाद हमारी — Saif Dehlvi
छोड़ूँगा नहीं मुजरिम-ओ-क़ातिल उसे कहना पहना दे मुझे तौक़-ओ-सलासिल उसे कहना ऐसे न दुखाए वो मेरा दिल उसे कहना रुसवा न करे वो सर-ए-महफ़िल उसे कहना लगता नहीं दुनिया में कहीं दिल उसे कहना बिन उस के मेरा जीना है मुश्किल उसे कहना ये राह-ए-मोहब्बत है मियाँ राह-ए-मोहब्बत इस राह में चलते नहीं बुज़दिल उसे कहना रब जाने दिवाना तेरा कब ख़ुद कुशी कर ले बैठा है सुब्ह से लब-ए-साहिल उसे कहना जीते जी मुझे देखने आया न वो लेकिन हो जाए जनाज़े में वो शामिल उसे कहना या तो वो किसी तरह से हासिल मुझे कर ले या फिर मुझे हो जाए वो हासिल उसे कहना जब तक हमें मंज़िल पे न ले आए वो यारो तब तक नहीं वो रहबर-ए-मंज़िल उसे कहना कहना कि बहुत ज़्यादा मैं मुश्किल में घिरा हूँ आसान करे वो मेरी मुश्किल उसे कहना ये सब दर-ओ-दीवार तो ऐसे ही सजे हैं वो शख़्स है आराइश-ए-महफ़िल उसे कहना दिखती हो जिसे सैफ़ ज़माने में ख़राबी आईना रखे अपने मुक़ाबिल उसे कहना — Saif Dehlvi