मालूम नहीं हम को किधर जाएँगे तुम बिन

महसूस ये होता है कि मर जाएँगे तुम बिन

फिर हम को समेटा नहीं जाएगा किसी से
इस तरह मिरी जान बिखर जाएँगे तुम बिन

ये चाँद सितारे ये बहारें ये नज़ारे
सारे ही मिरे दिल से उतर जाएँगे तुम बिन

पूछेगा कोई तुम को तो क्या उस से कहेंगे
तन्हा किसी महफ़िल में अगर जाएँगे तुम बिन

जिस राह पे चलते थे कभी साथ में हम तुम
उस राह पे अक्सर ही ठहर जाएँगे तुम बिन

कुछ लोग थे जिन के लिए जीना पड़ा हम को
वरना यही सोचा था कि मर जाएँगे तुम बिन

ऐ 'सैफ़' तुम्हारे सिवा कोई नहीं जिन का
सोचो ज़रा वो लोग किधर जाएँगे तुम बिन

— Saif Dehlvi

More by Saif Dehlvi

Other ghazal from the same pen

See all from Saif Dehlvi →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling