हमारे बस में है जो हम वो काम करते हैं
तुम्हारे हक़ में दुआ सुब्ह शाम करते हैं
अमीर-ए-शहरस हम राब्ता नहीं रखते
ग़रीब-ए-शहर का हम एहतिराम करते हैं
ये किस मक़ाम पे लाई है आशिक़ी हम को
जो रू-ब-रू नहीं उस से कलाम करते हैं
अब उन से राब्ता इतना है सिर्फ़ इतना है
कहीं मिलें तो दुआ-ओ-सलाम करते हैं
बहुत से लोग हैं बाक़ी कलाम पढ़ने को
सो हम ग़ज़ल को यहीं पर तमाम करते हैं
— Saif Dehlvi















