मानो हमारी बात ज़माना सही नहीं
हर बात हर किसी को बताना सही नहीं
अब उस गली में आप का कोई नहीं रहा
अब उस गली में आप का जाना सही नहीं
महफ़िल में काफ़ी लोग हैं मैं रो न पाऊँगा
इस वक़्त तेरी याद का आना सही नहीं
घर बार बेच डाला है बेटी के बाप ने
बारात कह रही है कि खाना सही नहीं
कैसी अजीब बात है जो ख़ुद ख़राब हैं
वो लोग कह रहे हैं ज़माना सही नहीं
वो सोच हो गई है ज़माने की अब कहीं
भाई बहन का साथ में जाना सही नहीं
ऐ 'सैफ़' जितना उन को बिठाए हुए हो तुम
इतना किसी को सर पे बिठाना सही नहीं
— Saif Dehlvi















