लोगों को दिलाएगी ग़ज़ल याद हमारी
होगी न कभी शा'इरी बर्बाद हमारी
ख़ुद साहिब-ए-औलाद है औलाद हमारी
फिर भी नहीं आती है उसे याद हमारी
रोता है सुब्ह शाम ये कह कह के फिलिस्तीन
मलबे में दबी मरती है औलाद हमारी
इस वक़्त-ए-मुसीबत में हमें देखना ये है
अब कौन करे आन के इमदाद हमारी
माबूद जहाँ भी रहे आबाद रहे वो
वो कर गया जो ज़िन्दगी बर्बाद हमारी
हम ख़ुद भी उन्हें भुल गए उन से बिछड़ कर
और उन को भी आई न कभी याद हमारी
हम सब से मुसीबत में मदद माँग रहे थे
अफ़सोस किसी ने न की इमदाद हमारी
जो हम को मिटाने के तलबगार हैं सुन लें
कम हो नहीं सकती कभी तादाद हमारी
हम तेरे अलावा न सुनाऍंगे किसी को
जो सुनना भी चाहे कोई फ़रियाद हमारी
देखो तो बदन क़ैद है बरसों से हमारा
सोचो जो अगर सोच है आज़ाद हमारी















