कुछ तो वो भी हो मेहरबान कहीं

अब्र बरसे तो हो मकान कहीं

दर्द दिल का कहें तो कैसे कहें
दिल की होती है क्या ज़बान कहीं

हम अजब कश्मकश में रहते हैं
दिल कहीं दे चुके बयान कहीं

इक कली को यहाँ तो जलना है
धूप आख़िर तो लेगी जान कहीं

वक़्त की बस यही ख़राबी है
इस की होती नहीं दुकान कहीं

गाहे-गाहे यही हो क्यूँ बोलो
तुम मिलो मुझ से पर हो ध्यान कहीं

चाँद सूरज भी दूर हैं हम से
हम कहीं हैं तो आसमान कहीं

ज़िंदगी तू धुआँ धुआँ क्यूँ है
रफ़्ता रफ़्ता जले है जान कहीं

आग ही आग है जहाँ देखो
रोज़ जलता है अब मकान कहीं

मौत आई तो ज़ीस्त ही न रही
किस तरह फिर बचे निशान कहीं

प्यार से सब जहाँ रहें मिल कर
ऐसा मिलता नहीं जहान कहीं

— Sanjay Bhat

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