डर गया हूँ मैं यार अंदर से
कम निकलता हूँ इस लिए घर से
जाने क्या कुछ गिरा था ऊपर से
इक बला थी जो टल गई सर से
जो बराबर नहीं मिला करता
आज गुज़रा मिरे बराबर से
बस यही सोच कर पड़ा हूँ मैं
कुछ तो मिलना ही है तिरे दर से
हक़ बयानी है शा'इरी मेरी
शा'इरी छोड़ दूँ तिरे डर से
— Shadab Shabbiri















