सैर-ए-गुलशन को जब वो आए हैं
तब कहीं फूल मुस्कुराए हैं
आग बरसेगी देखना इक दिन
ज़ुल्म-ओ-दहशत के अब्र छाए हैं
उन के रुख़्सार-ओ-लब-क़द-ओ-क़ामत
फिर से महफ़िल में खींच लाए हैं
आप की बात हम ने की ही नहीं
आप क्यूँ सुन के तिलमिलाए हैं
सुन रहा हूँ वो आ के जाएँगे
अश्क आँखों में डबडबाए हैं
— Shadab Shabbiri















