teraa jis din se intikhaab hua | तेरा जिस दिन से इंतिख़ाब हुआ

  - Shajar Abbas

तेरा जिस दिन से इंतिख़ाब हुआ
यार उस दिन से मैं खराब हुआ

छोड़कर तुम चले गए कूचा
चूर हमसाए मेरा ख़्वाब हुआ

देख के तुझको सब हैं हैरत में
खार के दरमियाँ गुलाब हुआ

और उभरी है शख़्सियत मेरी
जब से मैं साहिब-ए-किताब हुआ

सर को ख़म कर लिया नदामत से
हश्र में जब मेरा हिसाब हुआ

खो दी बीनाई तुझको रोते हुए
मुझ पे नाज़िल नया अज़ाब हुआ

क़ैस से हो गई जुदा लैला
'इश्क़ का इख़्तिताम-ए-बाब हुआ

वक़्त रहते जो हो गया बेदार
बस वही शख़्स कामयाब हुआ

हो गया जब ग़ुरूब सूरज तो
फिर नमू मेरा माहताब हुआ

तिश्ना-लब एड़ियाँ रगड़ते रहे
कब मयस्सर किसी को आब हुआ

जुज़ ये निकला शजर मोहब्बत का
अश्क़ बारी मेरा निसाब हुआ

  - Shajar Abbas

Ishq Shayari

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