ग़ज़ल है सारी मेरी सोगवार आ जाओ
रदीफ़ कहती है ये बार बार आ जाओ
कलेजा चाक है मरहम रखो रफ़ू करके
है दर्द-ए-इश्क़ मेरा बे-शुमार आ जाओ
उजड़ गया है गुलिस्तान सब मेरे माली
तुम अपने साथ में लेकर बहार आ जाओ
बहुत अकेला हूँ कोई भी मेरा यार नहीं
मुझे बनाने तुम अपना निगार आ जाओ
लगे हैं ख़ार जो इस दिल में राह-ए-फ़ुर्क़त पे
निकालने वो मेरे दिल से ख़ार आ जाओ
दिल-ए-ग़रीब मेरा बार बार कहता है
मेरे हबीब मेरे ग़म गुसार आ जाओ
शजर ये कौन सदा दे रहा है रो रोकर
मेरे हबीब मेरे जांँ निसार आ जाओ
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