हसद को ज़िंदा कर के देखते हैं
गली उस की गुज़र के देखते हैं
नहीं ये रास आई ज़िंदगी सो
चलो इक बार मर के देखते हैं
सभी बस देखते मंज़िल मगर वो
नहीं दुख सुख सफ़र के देखते हैं
नहीं मैं देखती तुम को अदा से
मुझे ये बात कर के देखते हैं
सभी कहते हैं उन को गुल-बदन सो
ख़ुदी गुलज़ार भर के देखते हैं
— Sohit Singla















