सुनो जब से वो मेरे सीने लगे हैं
मेरे जैसे मुर्दे भी जीने लगे हैं
बहुत ही अजब हैं हमारी निगाहें
वो पत्थर भी हमको नगीने लगे हैं
ग़ज़ल जिस को तुम ने मिनट में पढ़ा है
उसे लिखने में तो महीने लगे हैं
अजब से अजब है ये साक़ी का जादू
कि मयख़ाने भी अब मदीने लगे हैं
मेरी मय की तौहीन करने की ख़ातिर
वो ख़ुशियों में भी जाम पीने लगे हैं
यहाँ तक पहुँचना भी आसाँ नहीं था
मेरे माथे पे ख़ूँ पसीने लगे हैं
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