हवाओं का चराग़ों की कमी से वास्ता यारों

चराग़ों का उजाले की सदी से वास्ता यारों

हमें देखा तो रौशन ही नहीं चेहरा सनम उन का
है उन का सिर्फ़ रहता बरहमी से वास्ता यारों

वसीयत नाम हो जाए तो बेटे छोड़ जाते हैं
न बेटी ख़त्म करती ज़िंदगी से वास्ता यारों

जवाँ दिखने के कितने पैंतरे ये आज़माते हैं
कहाँ अब कौन रखता सादगी से वास्ता यारों

हमारी मुश्किलों में काम भी आता नहीं कोई
ये दुनिया रख रही है हम दमी से वास्ता यारों

— Sarvesh Pandey

More by Sarvesh Pandey

Other ghazal from the same pen

See all from Sarvesh Pandey →

Ujaala Shayari

Shers of ujaala.

All Ujaala Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling