REHAN KHAN

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REHAN KHAN shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in REHAN KHAN's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher(21)
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Sher

नोटों के बिन तो अपने भी पहचानते नहीं दौलत मिली तो घर में भी इज़्ज़त-नशीं हुए — REHAN KHAN
रात-दिन वक़्त बह रहा है यूँ जैसे मुट्ठी से रेत गिरती है — REHAN KHAN
लौ लगा बैठे हैं जब हम मालिक-ए-मुख़्तार से क्या बताएँ क्या मिलेगा हम को इस संसार से — REHAN KHAN
अँधेरी रात का मंज़र डराता है मुझे अक्सर गले लग कर रुलाती है मुझे मेरी ये तन्हाई — REHAN KHAN
मिरे ख़िलाफ़ अँधेरों की फ़ौज निकली थी मैं अपने घर का अकेला चराग़ काफ़ी था — REHAN KHAN
ये सियासत है यहाँ सच की हिफ़ाज़त कैसी लोग कुर्सी के लिए बाप बदल लेते हैं — REHAN KHAN
सारे झगड़े तो मिरे घर के चराग़ों ने किए धूप से मैं ने कभी बैर निभाया ही नहीं — REHAN KHAN
हम को मालूम था अंजाम-ए-मोहब्बत लेकिन हम ने इस खेल में हर चाल ख़ुशी से हारी — REHAN KHAN
जिस के होंठों पर मेरे लिए दुआ रहती है वो मेरी माँ है जो ख़ुद से ख़फ़ा रहती है — REHAN KHAN
माँ बिछड़ जाए तो ये बात समझ में आए धूप कितनी भी हो आँगन नहीं भरता उस से — REHAN KHAN
क़फ़स की तीलियों से टूट कर जो गिर गया हूँ मैं तुम्हारी आँख का तिनका था अब नश्तर बना हूँ मैं — REHAN KHAN
जो फूल शाख़ पे रहते हुए भी तन्हा रहा वो और किस के गुलिस्ताँ की आरज़ू करता — REHAN KHAN
राम लिखता हूँ कभी नाम-ए-मुहम्मद भी लिखूँ मुझ को तहज़ीब ने तफ़रीक़ सिखाई ही नहीं — REHAN KHAN
अब कोई देर से आने पे झिड़कता भी नहीं घर तो बाक़ी है मगर घर का उजाला न रहा — REHAN KHAN
एक ही ख़ाक से बनते हैं सभी लोग यहाँ कौन हिन्दू है मुसलमाँ है पता बा'द में है — REHAN KHAN
सामने भूख के मज़हब की कहाँ चलती है पेट खाली हो तो ईमान भी थक जाता है — REHAN KHAN
हम को दुनिया से शिकायत भी रही इश्क़ भी था हम किसी एक तबाही के तरफ़दार न थे — REHAN KHAN
सौदा न हो तो लोग यहाँ बाज़ार बदल लेते हैं हम से एक न बदला गया वो चार बदल लेते हैं — REHAN KHAN
ख़रीदेगा कोई क्या मेरे इन ख़्वाबों को पैसों से दुकानें बंद हैं सब की मिरा बाज़ार ज़िंदा है — REHAN KHAN

Ghazal

दिल की महफ़िल बड़ी हसरत से सजा दी हम ने फिर तेरे नाम पे हर चीज़ गँवा दी हमने फ़ासले तय न हुए हम से तुम्हारी ज़िद के दरमियाँ खींच के दीवार गिरा दी हम ने लोग कहते रहे घाटे का जुआ है उल्फ़त जानते बूझते भी बाज़ी लगा दी हम ने उम्र भर ज़ख़्म को जीने की दुआ देते रहे दर्द को अपनी ही धड़कन की सदा दी हम ने ख़ुद को खो कर तुझे पाने की सज़ा में अक्सर तेरी नफ़रत को भी उल्फ़त की जज़ा दी हमने ख़ाक होना था मुहब्बत में मुक़द्दर अपना अपनी ही राख को पुर-ज़ोर हवा दी हम ने लोग रोते रहे खो कर याँ ज़माने की ख़ुशी तेरी हसरत में ये दुनिया ही गँवा दी हम ने तेरी ख़ुशियों के उजाले की तलब थी 'रेहान' अपने कमरे में हर इक शाम बिता दी हम ने — REHAN KHAN
हुकूमत देख कर ज़ुल्म-ओ-सितम चुप-चाप सोती है हवा भी ख़ौफ़ के साये में याँ बेज़ार होती है सर-ए-बाज़ार लुटती है हया जब पाक-दामन की ये वहशत मुल्क के माथे पे काला दाग़ होती है रिहा होते हैं मुजरिम चंद घंटों में ज़मानत पर गवाही ख़ौफ़ के साये में अपनी जान खोती है निज़ाम-ए-वक़्त चलता है हुकूमत के इशारों पर यहाँ मासूम की ग़ैरत सर-ए-बाज़ार रोती है वही तारीख़ का चक्कर वही काग़ज़ के सब मलबे अदालत बेबसी का बोझ अपने सर पे ढोती है गवाही पैरवी मुंसिफ़ की अंधाधुंध रस्मों ने ग़रीबों के मुक़द्दर पे फ़क़त कालिख ही पोती है दिखावे के लिए तो मोमबत्ती हाथ में ली पर कहाँ ये सोच अंदर से ज़मीर-ए-ख़ल्क़ धोती है — REHAN KHAN
फ़रेबी इश्क़ की बंदिश से अब आज़ाद रहने दो बहुत रोया है ये दिल अब इसे दिलशाद रहने दो क़सम देकर बुलाओ मत मुझे तुम शहर में अपने कि दिल्ली दूर है जानाँ फ़रीदाबाद रहने दो ग़मों की धूप ने झुलसा दिया है शहर-ए-दिल्ली को सुकूँ है गाँव में मेरे यहीं आबाद रहने दो तुम्हारी सोच है हम हो गए हैं दर्द से पत्थर तुम्हारी सोच के सदक़े हमें बर्बाद रहने दो नया कोई फ़साना अब हमें भाता नहीं जानाँ जो गुज़री दिल पे बस वो इक पुरानी याद रहने दो बड़ी रौनक़ है दुनिया में मगर ये खाए जाती है अकेलेपन के इस कोने में दिल नाशाद रहने दो दिखावे की हवेली से मिरा क्या वास्ता जानाँ मिरे टूटे हुए घर की यही बुनियाद रहने दो समझदारी की बातें तुम ज़माने को सिखाओ अब हमारी धुन में हम को तुम यूँ ही उस्ताद रहने दो — REHAN KHAN
गँवा कर आबरू अपनी वो सब हासिल बताते हैं जो ख़ुद ही खो चुके हैं वो हमें मंज़िल बताते हैं जो सच कह दे वही ग़ाइब जो झूठा है वो ज़िंदा है सदाक़त को यहाँ के लोग अब बातिल बताते हैं ज़बाँ ख़ामोश रखने को ये नादानी समझ बैठे मगर झूठों को ये ही लोग फिर आक़िल बताते हैं यहाँ है मुंसिफ़ों का इक अलग तर्ज़-ए-अदालत भी हमीं को क़त्ल करते हैं हमें क़ातिल बताते हैं ये ऐसा दौर है जाहिल को तो सर पर बिठाते सब हर अहल-ए-इल्म को ये लोग फिर जाहिल बताते हैं जो कर दे चंद सिक्कों में यहाँ किरदार का सौदा हम ऐसे बे-ज़मीरों को नहीं आदिल बताते हैं — REHAN KHAN
कहाँ किरदार में अब वो पुराना ज़ोर-ओ-दम निकले जहाँ भी देखिए हर बात का मतलब रक़म निकले ग़रीबी आदमी को किस क़दर मजबूर करती है ज़ुबाँ ख़ामोश रहती है मगर आँखों से ग़म निकले न कोई पूछता था हाल जब ख़ाली थी जेब अपनी ज़रा पैसे हुए तो हर तरफ़ से मुहतशम निकले समझ बैठे थे जिनको दोस्त अपने ख़ून के रिश्ते ज़रूरत पर वही पीछे हटाते याँ क़दम निकले अना ग़ैरत वफ़ा जज़्बात सब नीलाम होते हैं जो सिक्के खन-खनाए तो कई चेहरे सनम निकले ये दुनिया मानती है बस उसी को साहिब-ए-क़ुदरत कि जिसकी जेब से हरदम यहाँ मोटी रक़म निकले मुझे इस दौर की 'रेहान' हर ठोकर ने समझाया यहाँ इंसान कम निकले मगर ज़्यादा भरम निकले — REHAN KHAN
दर्द दुनिया को मिरा हँस के बताते क्यों हैं वो परेशाँ हैं तो फिर मुझ को सताते क्यों हैं काम पड़ता था तो सीने से लगा लेते थे अब मिरे नाम से वो आँख चुराते क्यों हैं जिन को चलना था मिरे पाँव के छालों पे कभी अब वही लोग मिरे ज़ख़्म गिनाते क्यों हैं वक़्त बदला तो कई यार बदलते देखे सब पुराने मिरे एहसान भुलाते क्यों हैं सामने बनते हैं हमदर्द मिरे ग़म के सभी पीठ पीछे वही औक़ात दिखाते क्यों हैं जिन के किरदार पे पर्दे थे मिरी चुप के कभी वक़्त-ए-ग़ुर्बत में मिरी ख़ाक उड़ाते क्यों हैं मैंने जिस जिस को भी चाहा था भरोसे की तरह वो मिरे साए से अब ख़ौफ़-सा खाते क्यों हैं मैंने सीखा न था लोगों को बदलना वरना आज जितने हैं मिरे साथ ये आते क्यों हैं हम अगर कुछ भी नहीं उन के मुताबिक़ 'रेहान' वो हमें सामने फिर सर पे बिठाते क्यों हैं — REHAN KHAN
नसीब अपनी तमन्ना का आज़मा के चले गए थे भीड़ में तन्हाई हम चुरा के चले तुम्हारी बज़्म में सब का हुजूम था लेकिन हमीं थे ऐसे जो ख़ुद को यहाँ गँवा के चले वो एक रात की मेहमान थी जो बीत गई दिए बुझा के मिले थे दिए बुझा के चले जो दिल की बात थी होंठों पे आ नहीं पाई नज़र मिली थी मगर हम नज़र झुका के चले पलट के देखा नहीं उस ने एक बार हमें हम अपनी उम्र की सब बंदिशें भुला के चले वफ़ा की राह में बस ख़ार थे मुक़द्दर में सो अपने पाँव के छाले भी हम सजा के चले यहाँ किसी को किसी का ख़याल क्या होगा कि लोग लाश से भी रास्ता बचा के चले कहाँ तलाश करोगे कलाम शायर का मुशायरे से जो अपनी ग़ज़ल सुना के चले गिला नहीं है कोई अब ज़माने से 'रेहान' तमाम ज़ख़्म भी सीने में हम छुपा के चले — REHAN KHAN
वतन को बाँटने वालो तुम्हें ये ज्ञान क्या होगा जो बाँटे मुल्क में नफ़रत भला इंसान क्या होगा हैं याँ मंदिर भी मस्जिद भी गुरुद्वारे मज़ारें भी मगर हम ही नहीं होंगे तो हिन्दुस्तान क्या होगा मैं अपने मुल्क की ख़ातिर यही पूछूँगा बस हर सू जो दिल ही बँट गए तो मुल्क का सम्मान क्या होगा जो बच्चों को विरासत में अदावत दे रहे हो तुम बताओ उनका दुनिया में नफ़ा-नुक़सान क्या होगा सियासत के लिए हर दिन जो नफ़रत बो रहे हो तुम तुम्हारे बाद इस मिट्टी का फिर ईमान क्या होगा जो अपने देश की ख़ातिर कटा पाए न ये गर्दन वह ऐसा शख़्स फिर इस मुल्क का 'रेहान' क्या होगा — REHAN KHAN
ख़्वाब आँखों के ख़ज़ाने में नहीं आएँगे अश्क इतने हैं बहाने में नहीं आएँगे हम ने हँस कर ही गुज़ारी है हमेशा ये हयात हम कभी रोने-रुलाने में नहीं आएँगे हो गया बैठना-उठना जो रईसों में अब अब ग़रीबों के वो ख़ाने में नहीं आएँगे दर्द वो है जो लहू बन के रगों में दौड़े दर्द ये लिखने-लिखाने में नहीं आएँगे पढ़ सके गर तो मिरे दर्द मिरी आँख में पढ़ क़िस्से ये सारे सुनाने में नहीं आएँगे आख़िरी वक़्त भी रखते हैं अना पास में हम पाँव अब उन के दबाने में नहीं आएँगे तेरी दुनिया से जो जाएँगे तो वापस 'रेहान' फिर किसी और ज़माने में नहीं आएँगे — REHAN KHAN
हर तरफ़ बस शोर है नफ़रत भरे तूफ़ान का कौन अब करता है सौदा प्यार के सामान का मज़हबों के नाम पर कटते गले इंसान के क्या से क्या कर डाला तुम ने हाल हिंदुस्तान का रोज़ बिकता जा रहा है सच नई सत्ता तले क्या भरोसा अब किसी अख़बार के ईमान का ख़ून के धब्बे लिए कुर्तों पे नेता घूमते पूछने पर कह रहे हैं दाग़ है ये पान का राहज़न से क्या गिला करना कि ख़ुद ही रहनुमा लूटता सब को है लेकर भेष इक शैतान का नफ़रतों की चार-दीवारी में अब सब क़ैद हैं चंद लेकिन कर रहे हैं काम रौशनदान का वो ज़बानें बिक गईं करती थीं जो हक़ को बयाँ अब उठा रक्खा है बीड़ा झूठ के गुनगान का अब मुरासिल करते मुजरे चैनलों पर बैठ कर भूल बैठे फ़न यही था कोठे वाली शान का घर उजड़ने पर किसी का हँस रहे थे कल जो लोग ख़ुद पे बीती तब वो समझे हाल फिर 'रेहान' का — REHAN KHAN
मैं अपने आप से निकला तो कारवाँ में था अजीब शोर सा चारों तरफ़ जहाँ में था मैं अपने दर्द का किस-किस से तर्जुमा करता हर एक शख़्स यहाँ अपनी ही ज़ुबाँ में था मैं इक मकान में ठहरा था उम्र भर लेकिन मिरा वजूद किसी दूसरे मकाँ में था तमाम लोग थे चेहरे लिए हुए फिर भी न जाने कौन मिरी रूह के निशाँ में था मैं जिस सुकूत में उतरा था ख़ुद को पाने को वही सुकूत किसी चीख़ की अज़ाँ में था मैं एक उम्र भटकता रहा ख़ुद अपनी तरफ़ सफ़र भी जैसे मिरे पाँव के गुमाँ में था कोई तो था जो मिरे दिल के दरमियाँ भी रहा तभी वो शख़्स हमेशा ही दास्ताँ में था मैं अपनी रूह की आवाज़ सुन के लौटा था अजीब ख़ौफ़ सा दीवार-ए-दरमियाँ में था मिरी तलाश का अंजाम बस यही निकला कि जैसे तू ही तो 'रेहान' कारवाँ में था — REHAN KHAN
मुजरिम तो फिरेंगे सड़कों पर मासूम ही मारे जाएँगे अश्फ़ाक़ भी दौर-ए-हाज़िर के ग़द्दार पुकारे जाएँगे घर-घर से तिरंगा निकलेगा घर-घर से भगत सिंह आएँगे चमकाने वतन के ज़र्रों को हर घर के सितारे जाएँगे इस देश में फिर से ऊधम भी माटी का क़र्ज़ उतारेंगे जब नारे राम मुहम्मद के आज़ाद पुकारे जाएँगे तुम लाख बिछाओ ज़ंजीरें तुम लाख लगा लो पहरे पर जो हक़ के मुसाफ़िर निकले हैं वो मुल्क पे वारे जाएँगे फिर बोस की फ़ौजें निकलेंगी दिल्ली के तख़्त हिलाने को जितने भी यहाँ पर ज़ालिम हैं गद्दी से उतारे जाएँगे 'रेहान' वतन की माटी से ख़ुशबू-ए-वफ़ा ही आएगी जब वीर सभी इस मिट्टी के मिट्टी में सँवारे जाएँगे — REHAN KHAN

Nazm

"इक हसीन लड़की" तेरी पेशानी पे रौशन है सहर की हर लौ जैसे ख़ुर्शीद ने शबनम को दुआ दी हो अभी अब्र-आलूदा सी ज़ुल्फ़ों का परेशाँ अंदाज़ रात ठहरी हो किसी ख़्वाब में खोई हो अभी भौंहे ख़म खाए हुए क़ौस-ए-क़ज़ह की मानिंद आँख भी ऐसी कि नर्गिस भी हया करती है तेरे रुख़्सार की सुर्ख़ी है कि गुलशन की बहार जैसे फूलों पे ठहर जाए सहर की सी फुहार लब-ए-गुलफ़ाम पे ठहरी हुई शीरीं मुस्कान जैसे कलियों ने दुआओं में मिठासें घोलीं तेरी ठोड़ी का वो तिल हुस्न की तफ़्सीर-ए-लतीफ़ एक छोटे से सितारे में कई दुनिया बसीं गर्दन-ए-नाज़ पे बल खाती वो ज़ुल्फ़ों की घटा झील के जल पे उतर आई हो सावन की घनी तेरी चालों में छुपा नाज़ हया और वक़ार जैसे इक शेर लिखा जाए रवाँ नर्म हसीं तेरी बातों में अदब तेरी निगाहों में हया तेरी ख़ामोशी में भी एक इबादत-सी लगी हुस्न अल्फ़ाज़ में 'रेहान' बयाँ हो कैसे जो ग़ज़ल से भी परे ख़्वाब से आगे की चीज़ — REHAN KHAN
'शादी मुबारक' मुक़द्दर हो तिरा रौशन घटा सावन की छाई हो कि ख़ुशियाँ हर तरफ़ बरसें तिरी बारात आई हो तुझे मुझ से मुझे तुझ से ये आज़ादी मुबारक हो सुन ऐ महलों की शहज़ादी तुझे शादी मुबारक हो फ़लक का वो क़मर तेरे ही दामन ने समेटा हो कि इक रश्क-ए-क़मर जैसा तिरे घर में भी बेटा हो दुआ है तू रहे उसके बिना और वो न तेरे बिन फले-फूले तिरे इस घर में भी ख़ुशियाँ ये रातों-दिन तुझे दुनिया की हर इक चीज़ आसानी से मिल जाए उदासी में तिरा चेहरा ब-मिस्ल-ए-फूल खिल जाए मगर फिर ज़िंदगी तुझ को घड़ी वो भी दिखाएगी किया जो तू ने मेरे साथ तुझ पे आज़माएगी उदासी बेकसी बेचैनियाँ तुझ को भी फिर घेरें तिरी भी नींद उड़ जाए कि ख़ुशियाँ तुझ से मुँह फेरें तिरी हालत मिरी हालत से भी बदतर नुमायाँ हो रहे नाशाद तू हर दम तू मेरी मिस्ल-ए-गिर्यां हो क़फ़स से तेरे भी हर इक ख़ुशी आज़ाद हो जाए मुझे बर्बाद करने वाली तू बर्बाद हो जाए — REHAN KHAN
"ताजमहल" ताज तेरे लिए इक रौनक़-ए-फ़ुर्सत ही सही तेरी आँखों के लिए इक हसीं सूरत ही सही तुझ को इस वादी-ए-रंगीं से अक़ीदत ही सही मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से मुझ को मालूम है तुम भी इसी दुनिया की तरह इक चमकते हुए अफ़साने की क़ायल हो पर उन उजालों से जहाँ ख़्वाब भी संगीनों पर अपनी ताबीर का सामान सजाते होंगे पर ज़रा देखो कि इस हुस्न के परदे के तले किसी मेहनत का पसीना भी जड़ा होता है कितने मज़दूरों की आँखों का धुआँ शामिल है कितने गुमनाम दिलों का भी लहू होता है इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर अपने एहसास को पत्थर में तराशा होगा पर मोहब्बत तो न बाज़ार में बिकती है कभी न उसे सोने के मीनार में बाँधा जाए मैंने देखा है मोहब्बत के किराए का मकाँ माँ की रोटी की महक और फटे होंठों के निशाँ ख़ाली हाथों की लकीरों में कहाँ दर्द लिखा और उस आँख में जो ख़्वाब बचा था रक्खा ताज अगर इश्क़ की तौहीन नहीं तो क्या है जब ग़रीबों की मोहब्बत का पता तक न मिले इक महल पूरी ही दुनिया को दिखाया जाए शाह के इश्क़ का गुनगान सुनाया जाए मेरी महबूब उन्हें भी तो मोहब्बत होगी जिन के हिस्से में महल कोई न आया होगा जिन की बाहें न कभी यमुना किनारे भीगीं जिन के ख़्वाबों में कभी कोई न आया होगा इश्क़ का शोर मचाने से मोहब्बत कम है दो घड़ी साथ निभाने में मोहब्बत ज़्यादा एक पत्थर का चमकता हुआ क़िस्सा 'रेहान' एक इंसानी मोहब्बत से भला क्यों ज़्यादा — REHAN KHAN
'मिट्टी के ढेर' ज़मीं मिट्टी फ़लक मिट्टी मकाँ मिट्टी मकीं मिट्टी सिकंदर ढूँढने निकला था क्या मिट्टी के ढेरों में हसीं चेहरे जो कल तक थे वो ज़ेर-ए-ख़ाक सोए हैं कहाँ का हुस्न कैसा इश्क़ अब मिट्टी के ढेरों में जो उड़ते थे हवाओं में जिन्हें था नाज़ ख़ुद पर ही क़लंदर बन के बैठे हैं यहाँ मिट्टी के ढेरों में जिन्हें हम ज़िंदगी कहते जिन्हें हम जाँ समझते थे लहद में छोड़ कर आए उन्हें मिट्टी के ढेरों में न समझो ख़त्म मंज़िल को ये बस इक मोड़ है नादाँ नया इक रूप पाएँगे इन्हीं मिट्टी के ढेरों में नज़र जो आ रही है बस वही दुनिया नहीं होती निहाँ हैं नूर के दरिया इन्हीं मिट्टी के ढेरों में ज़रा सा देख कर चलना यहाँ इस ख़ाक के ऊपर शहंशाह-ए-ज़माँ सोए इन्हीं मिट्टी के ढेरों में — REHAN KHAN