अजब मोड़ पर है सफ़र ज़िंदगी का
मयस्सर नहीं एक पल भी ख़ुशी का
मिरे दिल के कोने में तस्वीर है जो
वो उन्वान है अब मिरी शाइरी का
तलबगार दुनिया में हैं दो तरह के
कोई इश्क़ का है कोई नौकरी का
कहीं पर है तानों की तलवार चलती
कहीं पर है रोना फ़क़त बेबसी का
मिरी बंद आँखों में जो पल रहा है
वो ख़्वाब आख़िरी है मिरी ज़िंदगी का
मुझे मौला इंसान अब मत बनाना
सबक़ मिल चुका है मुझे आदमी का
किसी भूखे का पेट तो भर सकूँ मैं
भला हो मिरी मौत से ही किसी का
ये 'रेहान' कहता है मरना है मुझ को
मगर रास्ता क्यूँ लूँ मैं ख़ुद-कुशी का
— REHAN KHAN















