मैं अपने आप से निकला तो कारवाँ में था
अजीब शोर सा चारों तरफ़ जहाँ में था
मैं अपने दर्द का किस-किस से तर्जुमा करता
हर एक शख़्स यहाँ अपनी ही ज़ुबाँ में था
मैं इक मकान में ठहरा था उम्र भर लेकिन
मिरा वजूद किसी दूसरे मकाँ में था
तमाम लोग थे चेहरे लिए हुए फिर भी
न जाने कौन मिरी रूह के निशाँ में था
मैं जिस सुकूत में उतरा था ख़ुद को पाने को
वही सुकूत किसी चीख़ की अज़ाँ में था
मैं एक उम्र भटकता रहा ख़ुद अपनी तरफ़
सफ़र भी जैसे मिरे पाँव के गुमाँ में था
कोई तो था जो मिरे दिल के दरमियाँ भी रहा
तभी वो शख़्स हमेशा ही दास्ताँ में था
मैं अपनी रूह की आवाज़ सुन के लौटा था
अजीब ख़ौफ़ सा दीवार-ए-दरमियाँ में था
मिरी तलाश का अंजाम बस यही निकला
कि जैसे तू ही तो 'रेहान' कारवाँ में था















