हुकूमत देख कर ज़ुल्म-ओ-सितम चुप-चाप सोती है
हवा भी ख़ौफ़ के साये में याँ बेज़ार होती है
सर-ए-बाज़ार लुटती है हया जब पाक-दामन की
ये वहशत मुल्क के माथे पे काला दाग़ होती है
रिहा होते हैं मुजरिम चंद घंटों में ज़मानत पर
गवाही ख़ौफ़ के साये में अपनी जान खोती है
निज़ाम-ए-वक़्त चलता है हुकूमत के इशारों पर
यहाँ मासूम की ग़ैरत सर-ए-बाज़ार रोती है
वही तारीख़ का चक्कर वही काग़ज़ के सब मलबे
अदालत बेबसी का बोझ अपने सर पे ढोती है
गवाही पैरवी मुंसिफ़ की अंधाधुंध रस्मों ने
ग़रीबों के मुक़द्दर पे फ़क़त कालिख ही पोती है
दिखावे के लिए तो मोमबत्ती हाथ में ली पर
कहाँ ये सोच अंदर से ज़मीर-ए-ख़ल्क़ धोती है















