"ताजमहल"

ताज तेरे लिए इक रौनक़-ए-फ़ुर्सत ही सही
तेरी आँखों के लिए इक हसीं सूरत ही सही
तुझ को इस वादी-ए-रंगीं से अक़ीदत ही सही
मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से

मुझ को मालूम है तुम भी इसी दुनिया की तरह
इक चमकते हुए अफ़साने की क़ायल हो पर
उन उजालों से जहाँ ख़्वाब भी संगीनों पर
अपनी ताबीर का सामान सजाते होंगे

पर ज़रा देखो कि इस हुस्न के परदे के तले
किसी मेहनत का पसीना भी जड़ा होता है
कितने मज़दूरों की आँखों का धुआँ शामिल है
कितने गुमनाम दिलों का भी लहू होता है

इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर
अपने एहसास को पत्थर में तराशा होगा
पर मोहब्बत तो न बाज़ार में बिकती है कभी
न उसे सोने के मीनार में बाँधा जाए

मैंने देखा है मोहब्बत के किराए का मकाँ
माँ की रोटी की महक और फटे होंठों के निशाँ
ख़ाली हाथों की लकीरों में कहाँ दर्द लिखा
और उस आँख में जो ख़्वाब बचा था रक्खा

ताज अगर इश्क़ की तौहीन नहीं तो क्या है
जब ग़रीबों की मोहब्बत का पता तक न मिले
इक महल पूरी ही दुनिया को दिखाया जाए
शाह के इश्क़ का गुनगान सुनाया जाए

मेरी महबूब उन्हें भी तो मोहब्बत होगी
जिन के हिस्से में महल कोई न आया होगा
जिन की बाहें न कभी यमुना किनारे भीगीं
जिन के ख़्वाबों में कभी कोई न आया होगा

इश्क़ का शोर मचाने से मोहब्बत कम है
दो घड़ी साथ निभाने में मोहब्बत ज़्यादा
एक पत्थर का चमकता हुआ क़िस्सा 'रेहान'
एक इंसानी मोहब्बत से भला क्यों ज़्यादा

— REHAN KHAN

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