वो खिड़की के पास खड़ी थीजाने कब से उदास खड़ी थीरुक रुक कर सब देख रहे थेपहने जो वो लिबास खड़ी थीसूना-सूना रस्ता देखेदिल में बाँधे आस खड़ी थीहोंठों पर थी ख़ुश्की ठहरीलेकर कब से प्यास खड़ी थीबात चली थी चारों जानिबलड़की किसकी ख़ास खड़ी थीख़त्म हुआ जब सारा मेलादुश्मन के वो पास खड़ी थी— REHAN KHAN