गँवा कर आबरू अपनी वो सब हासिल बताते हैं
जो ख़ुद ही खो चुके हैं वो हमें मंज़िल बताते हैं
जो सच कह दे वही ग़ाइब जो झूठा है वो ज़िंदा है
सदाक़त को यहाँ के लोग अब बातिल बताते हैं
ज़बाँ ख़ामोश रखने को ये नादानी समझ बैठे
मगर झूठों को ये ही लोग फिर आक़िल बताते हैं
यहाँ है मुंसिफ़ों का इक अलग तर्ज़-ए-अदालत भी
हमीं को क़त्ल करते हैं हमें क़ातिल बताते हैं
ये ऐसा दौर है जाहिल को तो सर पर बिठाते सब
हर अहल-ए-इल्म को ये लोग फिर जाहिल बताते हैं
जो कर दे चंद सिक्कों में यहाँ किरदार का सौदा
हम ऐसे बे-ज़मीरों को नहीं आदिल बताते हैं
— REHAN KHAN















