"इक हसीन लड़की"

तेरी पेशानी पे रौशन है सहर की हर लौ
जैसे ख़ुर्शीद ने शबनम को दुआ दी हो अभी

अब्र-आलूदा सी ज़ुल्फ़ों का परेशाँ अंदाज़
रात ठहरी हो किसी ख़्वाब में खोई हो अभी

भौंहे ख़म खाए हुए क़ौस-ए-क़ज़ह की मानिंद
आँख भी ऐसी कि नर्गिस भी हया करती है

तेरे रुख़्सार की सुर्ख़ी है कि गुलशन की बहार
जैसे फूलों पे ठहर जाए सहर की सी फुहार

लब-ए-गुलफ़ाम पे ठहरी हुई शीरीं मुस्कान
जैसे कलियों ने दुआओं में मिठासें घोलीं

तेरी ठोड़ी का वो तिल हुस्न की तफ़्सीर-ए-लतीफ़
एक छोटे से सितारे में कई दुनिया बसीं

गर्दन-ए-नाज़ पे बल खाती वो ज़ुल्फ़ों की घटा
झील के जल पे उतर आई हो सावन की घनी

तेरी चालों में छुपा नाज़ हया और वक़ार
जैसे इक शेर लिखा जाए रवाँ नर्म हसीं

तेरी बातों में अदब तेरी निगाहों में हया
तेरी ख़ामोशी में भी एक इबादत-सी लगी

हुस्न अल्फ़ाज़ में 'रेहान' बयाँ हो कैसे
जो ग़ज़ल से भी परे ख़्वाब से आगे की चीज़

— REHAN KHAN

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